रुस्वा हुए जो हम तो
ये दिल भर गया
तेरी गली में गए हम
तो ये पाँव थम गए
तेरी यादें मुझसे
भुलाई नहीं जातीं
तेरी पलकों की छाँव मुझसे
छोड़ी नहीं जाती
कौन कहता है कि हम
तनहा ही जीते हैं
कोई मेरी रूह में तो झांके
बाख़ुदा तेरी रूह मिल जाए|
रुस्वा हुए जो हम तो
ये दिल भर गया
तेरी गली में गए हम
तो ये पाँव थम गए
तेरी यादें मुझसे
भुलाई नहीं जातीं
तेरी पलकों की छाँव मुझसे
छोड़ी नहीं जाती
कौन कहता है कि हम
तनहा ही जीते हैं
कोई मेरी रूह में तो झांके
बाख़ुदा तेरी रूह मिल जाए|
जो गर तेरी राह में
हम फ़ना हो जाते
तो शायद हम आसमाँ से
पार हो जाते
मगर ये हो ना सका
तेरी याद ने हमें
जीने ना दिया
तेरी जुस्तजू ने हमें
फ़ना होने ना दिया
अब तो बस यही ख़्वाब है बाक़ी
तेरी खबर तो मिले
तेरी जुस्तजू तो रहे
कभी तुझे देखा कभी तुझे चाहा
मगर ये गिला है कि कह ना सके हम
कभी तुझे सुना कभी तुझे पाया
मगर ये गिला है कि मिल ना सके हम
कभी तुझे जाना कभी तुझे माना
मगर ये गिला है कि जुड़ ना सके हम
कभी तुझे भूले कभी तुझे ढूँढा
मगर ये गिला है कि गुम हो गए तुम
कभी तुझसे बोले कभी हम लड़े भी
मगर ये गिला नहीं कि जिए ही नहीं हम
कहा तुमने की तुम
चले जाओ
हम इतने नासमझ निकले
चले गए
वहाँ तुम ग़ुस्साए
रह गए
यहाँ हम झल्लाए
रह गए
जो ग़र तुम्हारी
मर्ज़ी समझ जाते
तो हम कहीं नहीं जाते
और जो ग़र तुमने
कह दिया होता की ना जाओ
तो शायद आज भी
हम दोनों बंधे बंधे होते|
मेरी ज़िंदगी बड़ी वीरान पड़ी है
बेरंग है, सन्नाटे से भरी है
कभी यहाँ भटकती हूँ
कभी वहाँ ठहरती हूँ
कहते हैं ख़ूबसूरती
देखने वाले की आँखो में है
ए रक़ीब मेरी ज़िंदगी पे
एक नज़र डाल दे
तो में भी बाग़बान बन जाऊँ |
कहतें हैं कि इस दुनिया में
ख़ज़ाना असीम है
बावरी हूँ मैं
जो इसे ढूँढने चली
लाखों दिल टटोले
लाखों से बात की
पर मिला जो मुझको
तो सिर्फ़ बेचारी, बेक़सी और तन्हाई
जो ख़ज़ाना है ज़िंदगी का
ख़ुशी, सब्र और इल्म
ये कहीं भी ना मिला
ए दोस्त ग़र तुम्हें
ये ख़ज़ाना कहीं मिले
तो पता देना ज़रूर मुझको भी
कि इक बूँद ख़ज़ाने की
मुझको भी दरकार है |
ज़द – ओ – ज़हद ज़िंदगी की
कुछ इस तरह उलझ गई
ना दिन का पता रहा
ना ख़बर रात की रही
चल रहे हैं हम दिन रात
जाना कहाँ है हमको इसकी ख़बर नहीं
ना तो मंज़िल है कोई
ना है कोई कारवाँ
जो ग़र मंज़िल का पता चले
तो ख़बर राह की मिले
ज़द – ओ -ज़हद से फिर हम
सफ़र पर निकल पड़ें |
ये जिस्म -ओ- जान की लड़ाई
मेरी पहचान की नहीं
ना ये जिस्म मेरा है
और ना ये जान मेरी है
जिस्म मिट्टी का है
जिसे मिट्टी में ही मिल जाना है
जान वतन की है
जिसे इक दिन फ़ना हो जाना है
जो जान की ख़ातिर
मेरा ये जिस्म मिट जाए
तो ख़ुदा की क़सम
मेरी रूह को आराम आ जाए|
ना तो अपने जहाँ को छोड़ पाऊँगी मैं
ना तुम्हारी यादें ही भुला पाऊँगी मैं
तेरा साया बनके ना जी पाऊँगी मैं
ना तुझे अपना साया ही बना पाऊँगी मैं
मेरा कर्म, मेरा फ़र्ज़ रोकता है मुझे
तेरा कर्म, तेरा जज़्बा रोकता है तुझे
दो किनारे है नदी के हम
जो चाह कर भी मिल ना पाएँगे
पर मिल कर हम रस्मों रिवाजों को बांध पाएँगे
दुनिया को मिटने से रोक पाएँगे
जो गर हम ना मिल सके तो क्या
नावों को किनारे तो लगा पाएँगे
हम जैसे कुछ औरों को तो मिला पाएँगे
यही ज़िंदगी है हमारी, यही तक़दीर है
और कुछ ना भी किया तो क्या, ये तो हम कर ही जाएँगे