ना तो अपने जहाँ को छोड़ पाऊँगी मैं
ना तुम्हारी यादें ही भुला पाऊँगी मैं
तेरा साया बनके ना जी पाऊँगी मैं
ना तुझे अपना साया ही बना पाऊँगी मैं
मेरा कर्म, मेरा फ़र्ज़ रोकता है मुझे
तेरा कर्म, तेरा जज़्बा रोकता है तुझे
दो किनारे है नदी के हम
जो चाह कर भी मिल ना पाएँगे
पर मिल कर हम रस्मों रिवाजों को बांध पाएँगे
दुनिया को मिटने से रोक पाएँगे
जो गर हम ना मिल सके तो क्या
नावों को किनारे तो लगा पाएँगे
हम जैसे कुछ औरों को तो मिला पाएँगे
यही ज़िंदगी है हमारी, यही तक़दीर है
और कुछ ना भी किया तो क्या, ये तो हम कर ही जाएँगे