जिस्म -ओ -जान

ये जिस्म -ओ- जान की लड़ाई
मेरी पहचान की नहीं 
ना ये जिस्म मेरा है 
और ना ये जान मेरी है 
जिस्म मिट्टी का है 
जिसे मिट्टी में ही मिल जाना है 
जान वतन की है 
जिसे इक दिन फ़ना हो जाना है 
जो जान की ख़ातिर 
मेरा ये जिस्म मिट जाए 
तो ख़ुदा की क़सम 
मेरी रूह को आराम आ जाए|

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