मंज़िल

ज़द – ओ – ज़हद ज़िंदगी की
कुछ इस तरह उलझ गई 
ना दिन का पता रहा 
ना ख़बर रात की रही 
चल रहे हैं हम दिन रात 
जाना कहाँ है हमको इसकी ख़बर नहीं 
ना तो मंज़िल है कोई 
ना है कोई कारवाँ 
जो ग़र मंज़िल का पता चले
तो ख़बर राह की मिले 
ज़द – ओ -ज़हद से फिर हम 
सफ़र पर निकल पड़ें |

Leave a comment